ईडी ने ममता बनर्जी पर लगाया ऑफिस में दखल और बाधा देने का आरोप

सुप्रीम कोर्ट आज प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रहा है, जिसमें पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनकी सरकार पर I-PAC कार्यालय और उसके निदेशक प्रतीक जैन के आवास पर ED की छापेमारी में दखलअंदाजी करने और बाधा डालने का आरोप लगाया गया है। इस मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश प्रशांत कुमार मिश्रा और विपुल पंचोली की बेंच कर रही है। इससे पहले ED ने 9 जनवरी को कलकत्ता उच्च न्यायालय में भी इस संबंध में याचिका दायर की थी, जिसमें ममता बनर्जी के खिलाफ CBI जांच की मांग की गई थी। लेकिन हाई कोर्ट में हुई व्यवधान के कारण सुनवाई नहीं हो पाई। अब यह मामला सर्वोच्च न्यायालय में पहुंच चुका है।
ED के तर्क: लोकतंत्र पर खतरा और अधिकारीयों की सजा की मांग
सुप्रीम कोर्ट में ED की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बताया कि इस घटना से एक बेहद चिंताजनक पैटर्न सामने आया है। उन्होंने कहा कि इस प्रकार की घटनाएं केंद्रीय एजेंसियों के कामकाज को कमजोर करेंगी और राज्य सरकारों को यह विश्वास दिलाएंगी कि वे छापेमारी में बाधा डाल सकते हैं, चोरी कर सकते हैं और फिर धरना भी दे सकते हैं। उन्होंने कहा कि इसके खिलाफ एक मिसाल कायम करनी होगी और मौके पर मौजूद अधिकारियों को तुरंत निलंबित किया जाना चाहिए। मेहता ने बताया कि I-PAC कार्यालय से आपत्तिजनक सामग्री भी मिली थी। साथ ही उन्होंने कलकत्ता हाई कोर्ट में हुई उस घटना की भी निंदा की जिसमें बड़ी संख्या में वकील और अन्य लोग घुस आए थे। उनका कहना था कि जब लोकतंत्र की जगह भीड़ का राज आ जाए तो ऐसा होता है।

ममता बनर्जी के वकील कपिल सिब्बल के जवाब
पश्चिम बंगाल मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की ओर से सुप्रीम कोर्ट में अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने तर्क दिया कि मुख्यमंत्री द्वारा सभी उपकरण ले जाने का आरोप गलत है। उन्होंने कहा कि इस बात की पुष्टि खुद ED के द्वारा बनाए गए पंचनामा से भी होती है। उनका कहना था कि यह आरोप केवल पक्षपात और दुष्प्रचार करने के लिए लगाया गया है। कपिल सिब्बल ने कोर्ट को बताया कि वे पंचनामा के माध्यम से सही जानकारी दे रहे हैं और आरोपों को गलत साबित कर रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट का रुख: जांच की आवश्यकता और नोटिस जारी करने का संकेत
इस जवाब पर न्यायाधीश प्रशांत कुमार मिश्रा ने कहा कि ED और ममता बनर्जी की तरफ से दिए गए दावे विरोधाभासी हैं। अगर ED का उद्देश्य वस्तुएं जब्त करना था तो वे ऐसा कर सकते थे लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि मामले की गहन जांच होनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि अदालत को नोटिस जारी करने से कोई नहीं रोक सकता। इसका मतलब है कि सुप्रीम कोर्ट जल्द ही मामले में पक्षकारों को नोटिस जारी कर आगामी सुनवाई के लिए तैयार हो सकता है। इस पूरे मामले पर उच्चतम न्यायालय का फैसला राजनीतिक और कानूनी दोनों ही स्तर पर महत्वपूर्ण माना जा रहा है।